ये ब्रज भाषा - खड़ी बोली में मेरा प्रथम spontaneous प्रयास है. किसी निकटतम परिचित के बारे में विचार करते हुए ये शब्द मेरे मन में काव्य रूप में फूट पड़े. प्रस्तुत है -
मैया. भैया बहना री !
खुद कु मैं तो खुद ही बिसरी
काहू से का कहना री !!
जो मोहे भरतार मिले री
मोकु समझे नहीं सके ;
दुखी रखें वे, रखें सुखी- ओ !
संग उनी के रहना री !
ललना मोरे दोनु छोटे
छोटन ते भी प्रीत घनी;
मेरे दोनों राम लखन जे,
जे ही मेरा गहना री !
छोर देई है आस तो सब से
अपने पे ही छोरी व्हय --
जो रच राखी बन्सीवाले -
वा तो हो के रहना री !
मुंबई, १४.०२.२०१२
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