Monday, July 25, 2011

उम्र बिता दी

उम्र बिता दी बेज़ा हमने
अच्छे से कुछ कर न सके
पूरा जूझ न पाए गम से
पूरा और हम डर न सके

अच्छा जिसको समझा हमने
उसने ही तो बुरा किया
बुरा जो करते थे उनका भी
अच्छा थोडा कर न सके
उम्र बिता दी बेजा हमने..

खुश थे कितने 
कितने गमगीं
कितने ऐसे वैसे थे
जैसे थे वैसे अच्छे थे
बदल नया कुछ कर न  सके
उम्र बिता दी बेज़ा हमने..

बचपन के कितने थे अरमाँ
कितने ही तो सपने थे
सपने ही सपने रह पाए
बच्चे थे - कुछ कर न सके
उम्र बिता दी बेज़ा हमने

बदल गया जो हमको उसने
मुडके भी फिर न देखा
दूर तलक बस देख ही पाए
रहे पड़े जड़ - चल न सके
उम बिता दी बेज़ा हमने

कभी कहीं तो कभी कहीं पर
सोचा कहीं किनारा हो
घुमे ऐसे ही आवारा
एक कोई घर कर न सके
उम्र बिता दी बेज़ा हमने...

कभी उसे ईमान बनाया
उसकी कहीं दुहाई दी
लेकिन कोई एक ही मालिक
अल्लाह इश्वर कर न सके
उम्र बिता दी बेज़ा हमने...


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