जला नहीं सकती है अग्नि,
काट नहीं सकती तलवार !
नहीं डुबोता पानी मुझको -
पवन न पाए मुझ से पार !!
मैं अनंत हूँ दिव्य सनातन ,
मैं सत हूँ चित्त हूँ आनंद |
मुक्त उडूं मैं परमहंस-सा.
बांध सके न कोई फंद !
आता जो कुछ पंचद्वार से
और जो कुछ जाता बाहर
बस वो है एक छल, एक सपना -
मिले न कुछ उसको पाकर...
जानता हूँ मैं सत्य सनातन
और जानता मैं अनश्वर !
हूँ तो इस धरती का मानव
पर मैं ही हूँ परमेश्वर !!
मैं निस्सीम मैं विभु मैं व्यापक
न कुछ मेरा पारावार !
सूक्ष्म भी मैं, अतिसूक्ष्म भी मैं ही -
मैं जीवन ! मैं ही संसार !!
सुनो सुनो, ओ ! यदि जो चाहो
जीवन जीने की विद्या -
"एक बस तुम ही सत्य सनातन
बाकि सब है जड़, मिथ्या"
"जो तुम हो बस उसको जानो
बाकि जो भी सब है शेष
छोड़ दो उसको जैसा है वो
रहो सदा बस तुम निः शेष "
- भुबनेश्वर १३ फ़रवरी २००११
दोपहर ०२:५७
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