Saturday, December 31, 2016

लेखा-जोखा

बीत गए कुछ लम्हे  हँसते,
रोते रोते   कुछ बीते  -
कितना ही  कुछ हार गए हम ,
लेकिन  थोडा-सा जीते..

दूर कहीं  जो  बीत गयी   वो
बात पुरानी लगती है -
रोज़ नया दिन अब तो हमको
नयी कहानी लगती है ;
दिल के जो  भी हुए थे टुकड़े
बैठे हैं उनको  सीते -
कितना ही कुछ हार गए हम,
लेकिन थोडा-सा जीते ..

जिनको भी समझा  था  अपना-
जिनसे दुनिया बसती थी,
जिनके होने से ही हम थे
जिनसे अपनी हसती थी -
छोड़ गए वो कितना तनहा,
आंसू  भी अब तो रीते !
कितना ही कुछ हार गए हम,
लेकिन थोडा-सा जीते ..

जीवन के हैं खेल निराले
हार-जीत  का  पता  नहीं -
शीशमहल- सा जादू है सब ;
सही गलत, तो गलत सही !
कहीं कहीं पे सही रहे हम
लेकिन कहीं गलत भी थे -
कितना ही कुछ हार गए हम,
लेकिन थोडा-सा जीते..


भुवनेश्वर 
२९-३० दिसंबर २०१० 

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