'गर तुम यूँ मुझ पर न मरतीं
तो शायद कुछ अच्छा होता...
न सोचा करतीं तुम ऐसे
भला रहूँ मैं रहूँ जहाँ भी
'गर चुप्पी हमको न अखरती -
तो शायद कुछ अच्छा होता..
होती तुम भी औरों जैसीं
वफ़ा निभाना खुदा न होता
सोच ज़रा यूँ दूर निकलती-
तो शायद कुछ अच्छा होता..
- वाशी, २४.०५.१०