Sunday, March 21, 2010

डूब रहा हूँ


डूब रहा हूँ तनहा तनहा
धीमे धीमे गहरे गहरे
अनजाने से लगते सारे
जाने पहचाने से चेहरे

दूर भागता अपने से ही
जाने कहाँ चला आया हूँ
नहीं जानता कौन हूँ मैं अब
बस अपना ही एक साया हूँ

कहाँ है जाना कौन ठिकाना
कौन डगर है पता नहीं है
किसको मानू कौन है अपना
कौन पराया पता नहीं है

किस मंजिल पे थमने वाला 
कैसे है कारवां ये मेरा
आज  अकेला एकदम है जो
कल तक था हमनवां जो तेरा

ढूंढ रहा हूँ कोई ऐसा 
जो मुझको थामे थोडा-सा 
रोक ले मुझको बस इतने पे
सहलाये मन का फोड़ा-सा

जब किस्मत में होगा मिलना
तब ही मैं पाउँगा उसको
यक्ष प्रश्न तो यही है तब तक
थामूं मैं, हाँ, थामूं किसको ?

3 comments:

  1. i had thought tu swimming seekh gya hoga :)

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  2. किस मंजिल पे थमने वाला
    कैसे है कारवां ये मेरा
    आज अकेला एकदम है जो
    कल तक था हमनवां जो तेरा

    इन पंक्तियों ने दिल छू लिया... बहुत सुंदर ....रचना....

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  3. Priti shetty6:04 PM

    its too good i am very much impressed

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