Saturday, December 24, 2016

ब्रह्म

सारे मुख उस एक ब्रह्म के -
सारे नेत्र उसी के हैं ;
हैं सारी नासिका उसी की -
सारे क्षोत्र उसी के हैं !

एक वही जो सदा भासता -
लेकर नित नित रूप नए ;
दिखते हैं जो और ना दिखते -
सब स्वरूप उसी के हैं !

सब विचार उस एक ह्रदय के -
एक ही है मन हम सब का ;
मात , पिता , गुरु स्वयं वही है -
हम सब बाल उसी के हैं !

एक वही बन पवन है बहता
हर वन उपवन , हर घाटी ;
छम -छम -छम सावन में बरसें -
काले मेघ उसी के हैं !

वही रवि है बना दिवस में -
औ' रात्रि का शशि वही ;
कितने अगणित , नभ में शोभित -
तारक रत्न उसी के हैं !

वही विष्णु , वही ब्रह्मा , वही शिव
बना हुआ है विराज रहा ;
सृष्टि , पालन संहरों के
सारे खेल उसी के हैं !

नही शेष कुछ सिवा उसी के -
सब कुछ उस से आच्छादित ;
ये मन , ये तन , ये श्वासें औ '
अब ये प्राण उसी के हैं !

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