आज मेरी स्तिथि है
उस
अर्जुन जैसी -
जो खड़ा है महासमर में
दो सेनाओं के बीच
अपने कर्तव्य से
विमुख हुआ जाता है जो ;
जानता है
पूरे पक्ष की इच्छाओं और अभिलाषाओं
का बोझ उसे ही उठाना है
अपने कन्धों पर -
पर
वे कंधे ही आज शिथिल पड़ गए हैं !
गुंजायमान कर देता
तीन भुवन को जो -
उसी गांडीव की टनकार आज
डरा रही है निज मन को ही ...
क्या कारण है ??
पता नही ..
मन किसी अनजाने अनिष्ट की आशंका से
कम्पित हुआ जाता है ;
आवश्यकता है आज
उसे किसी कृष्ण की -
जो अपने गीता ज्ञान से
काटे भ्रम के तम को
दिखाए रह सही
इस डरे हुए अर्जुन को
राह
सही , कर्तव्यपरायणता की ...
३० .०४ .०१
उस
अर्जुन जैसी -
जो खड़ा है महासमर में
दो सेनाओं के बीच
अपने कर्तव्य से
विमुख हुआ जाता है जो ;
जानता है
पूरे पक्ष की इच्छाओं और अभिलाषाओं
का बोझ उसे ही उठाना है
अपने कन्धों पर -
पर
वे कंधे ही आज शिथिल पड़ गए हैं !
गुंजायमान कर देता
तीन भुवन को जो -
उसी गांडीव की टनकार आज
डरा रही है निज मन को ही ...
क्या कारण है ??
पता नही ..
मन किसी अनजाने अनिष्ट की आशंका से
कम्पित हुआ जाता है ;
आवश्यकता है आज
उसे किसी कृष्ण की -
जो अपने गीता ज्ञान से
काटे भ्रम के तम को
दिखाए रह सही
इस डरे हुए अर्जुन को
राह
सही , कर्तव्यपरायणता की ...
३० .०४ .०१
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