Sunday, December 25, 2016

किसी कलम से यूं ही

सोचा करता हूँ भूलूं तुम्हे ,
पर लगता है तुम याद कहाँ ....
तुम बसती हो मेरे मन में ,
या कोई छलावा बसा वहाँ .

ये प्रेम है या ये श्रद्धा है ,
मैं पता नही कर पता हूँ ....
देखो तो कैसा खेल है ये ,
ख़ुद अपनी थाह न पाता हूँ .

मन मेरा थोड़ा चंचल है ,
बस तुम पर ही आ जाता है ...
सोचा करता बस तुमको ही ,
कुछ और न करने पाता है .

मैंने इसको है समझाया ,
कुछ धमकाया , कुछ फुसलाया ....
पर मेरी एक न सुनता है ,
अपने ही सपने बुनता है ,
खोया रहता बस तुम में ही ,
कुछ और नही , कुछ और नही .


अब मैंने निश्चय है ठाना -
तुम को होगा मन से जाना ...
या सुननी होगी व्यथा मेरी ,
ये प्रेम की करुण-सी कथा मेरी .

कुछ तुम बोलो , कुछ हम बोलें ,
मन के सारे बन्धन खोलें ...
न जाने मन में रहता क्या ,
चुप तभी था मैं कुछ कहता क्या

2 comments:

  1. ye to kaam aayegi...........aage.......

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  2. Dheeraj Garg2:52 AM

    Very Nice Dear...Keep it up...

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