Monday, October 01, 2007

एक कोना

खाली खाली आज दिल का
एक कोना भासता है
कुछ छुपी , कुछ दबी , उलझी
जाने कैसी दान्स्ता है

एक कोना - जो हरा था
औ` भरा था प्रेम रस से
हो गया था सूख जर्जर
हुए थे सब स्वप्न अवश से

सोच बैठा था ये माली -
रीता उपवन सूखी डाली
उस समय उस जड़ चमन की
तुमने क्यारी सींच डाली

लहलहाई फ़िर से कलियाँ
पंछी फ़िर से चहचहाये
मत्त हो उस मत्तता में
खग -विहग ने गीत गाये

माली भी पुलकित हुआ तब
था मुदित मन वो प्रफुल्लित
पर प्रारब्ध की चाल टेढ़ी
भाग्य के भी खेल कुत्सित

क्यारी टूटी जाने कैसे
जाने कैसे स्रोत्र सूखा
प्रेम रस से भीना -भीना
वो ह्रदय भी हुआ रूखा

डाली सूखी , सूखा उपवन
खग -विहग का करूँ क्रन्दन
चीरता दिल , करता टुकड़े -
माली का उजड़ा था उपवन

छोडो , वह तो है पुरानी
बात , ये सब कालवश था
मेरा ही मन था वो उपवन -
मैं था माली - मैं विवश था

आज जाने क्या हुआ है
कौन रौ है , क्या पता है
खाली -खाली आज दिल का
एक कोना भासता है ...

09.11.05

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