सखी ! बड़ी ही निर्मोही तुम -
निर्मम है पाषाण ह्रदय -
कोमल भाव जो देख न पाया ,
न देखा नैनों का अमय ...
न जाना तूने किस भांति
व्याकुल रहते प्राण मेरे -
ज्यों चातक-सा था मन मेरा
स्वाति थे जो नैन तेरे ...
कभी न जानी पीड़ हिये की -
न आकुल अन्तर जाना ,
पास बुला फिर घोर उपेक्षित
करना ही मंतर माना ...
क्या क्रीडा , कुछ समझ न पाया -
न जाना ये खेल तेरा ,
ज्ञात तुझे किंचित पहले था -
हो न मुझसे मेल तेरा ...
ऐसा था तो है ! फ़िर क्यो
खेल किया ये संग मेरे ?
क्यो गा के रागिनी जगाया -
सुप्त पडे जो भाव मेरे !
दैव रचित निज भाग्य जानकर
मैं लेता संतोष अभी -
लेकिन तूने क्या पाया , ओ !
तोड़ के मेरे स्वप्न सभी ?
- कोलकाता , 25.02.07, 08:38 PM
निर्मम है पाषाण ह्रदय -
कोमल भाव जो देख न पाया ,
न देखा नैनों का अमय ...
न जाना तूने किस भांति
व्याकुल रहते प्राण मेरे -
ज्यों चातक-सा था मन मेरा
स्वाति थे जो नैन तेरे ...
कभी न जानी पीड़ हिये की -
न आकुल अन्तर जाना ,
पास बुला फिर घोर उपेक्षित
करना ही मंतर माना ...
क्या क्रीडा , कुछ समझ न पाया -
न जाना ये खेल तेरा ,
ज्ञात तुझे किंचित पहले था -
हो न मुझसे मेल तेरा ...
ऐसा था तो है ! फ़िर क्यो
खेल किया ये संग मेरे ?
क्यो गा के रागिनी जगाया -
सुप्त पडे जो भाव मेरे !
दैव रचित निज भाग्य जानकर
मैं लेता संतोष अभी -
लेकिन तूने क्या पाया , ओ !
तोड़ के मेरे स्वप्न सभी ?
- कोलकाता , 25.02.07, 08:38 PM
ur tooooo talented man...hatz off 2 u.....
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