Wednesday, December 14, 2016

प्रलाप

सखी ! बड़ी ही निर्मोही तुम -
निर्मम है पाषाण ह्रदय -
कोमल भाव जो देख न पाया ,
न देखा नैनों का अमय ...

न जाना तूने किस भांति
व्याकुल रहते प्राण मेरे -
ज्यों चातक-सा था मन मेरा
स्वाति थे जो नैन तेरे ...

कभी न जानी पीड़ हिये की -
न आकुल अन्तर जाना ,
पास बुला फिर घोर उपेक्षित
करना ही मंतर माना ...

क्या क्रीडा , कुछ समझ न पाया -
न जाना ये खेल तेरा ,
ज्ञात तुझे किंचित पहले था -
हो न मुझसे मेल तेरा ...

ऐसा था तो है ! फ़िर क्यो
खेल किया ये संग मेरे ?
क्यो गा के रागिनी जगाया -
सुप्त पडे जो भाव मेरे !

दैव रचित निज भाग्य जानकर
मैं लेता संतोष अभी -
लेकिन तूने क्या पाया , ओ !
तोड़ के मेरे स्वप्न सभी ?

- कोलकाता , 25.02.07, 08:38 PM

1 comment:

  1. ur tooooo talented man...hatz off 2 u.....

    ReplyDelete