Tuesday, October 30, 2007

याचना

इस जग-जगती के प्राणों में ,
हो बस तेरा आधार , हरे !

इस सकल जगत की क्रीडा में ,
होवे लीला विस्तार , हरे !!

हो लक्ष्य यही इस जीवन का -
पावें तुझको साकार , हरे !

इतनी तू कृपा कर दे , भगवन ,
रहे ह्रदय में तेरा प्यार , हरे !!

३० .०६ .०६
दोपहर

पीड़ा

किसने देखा मेरे अन्दर -
किसने झाँका ??
इस जीवन में सदा रहा है
प्रेम का फाँका ...

ना कभी कोई ऐसा आया
जो कभी पीड समझे मन की -
जो समझे भाषा शब्दहीन ,
जो साध मिटा दे जीवन की ...

किसने मुझ को मानव समझा ,
किसने समझे हैं भाव मेरे ?
ना कोई मरहम रखता है ,
है हरे अभी भी घाव मेरे ...

मैं नही मांगता कुछ भारी -
बस इतना - मैं भी एक नर हूँ ,
नर सा व्यवहार करो मुझसे ,
मैं इस विनती का अक्षर हूँ ...

मेरे जीवन के खुले पृष्ठ ,
आ कभी तो झाँक पढो इनमें -
मेरे जीवन के जो अनुभव
पा जाओ शायद कुछ उन में ...

मैं भी तुम सा मानव बन्धु
ना साधू ना वनचारी हूँ ,
मेरी दुनिया भी यही , अरे ,
मैं भी तो इक संसारी हूँ ...

कोई हो जिस से कहूँ व्यथा ,
निज जीवन की कुछ कहूँ कथा ,
वो भी बोले कुछ - सुनु मगन ,
चलती सुंदर ये रहे प्रथा ...

हों एक दूसरे के पूरक -
एक दूजे को सम्पूर्ण करें ,
संतोष , शान्ति औ' आनंद से ,
इस जीवन को आपूर्ण करें .

३० .०६ .०६
०० .१५

Monday, October 01, 2007

एक कोना

खाली खाली आज दिल का
एक कोना भासता है
कुछ छुपी , कुछ दबी , उलझी
जाने कैसी दान्स्ता है

एक कोना - जो हरा था
औ` भरा था प्रेम रस से
हो गया था सूख जर्जर
हुए थे सब स्वप्न अवश से

सोच बैठा था ये माली -
रीता उपवन सूखी डाली
उस समय उस जड़ चमन की
तुमने क्यारी सींच डाली

लहलहाई फ़िर से कलियाँ
पंछी फ़िर से चहचहाये
मत्त हो उस मत्तता में
खग -विहग ने गीत गाये

माली भी पुलकित हुआ तब
था मुदित मन वो प्रफुल्लित
पर प्रारब्ध की चाल टेढ़ी
भाग्य के भी खेल कुत्सित

क्यारी टूटी जाने कैसे
जाने कैसे स्रोत्र सूखा
प्रेम रस से भीना -भीना
वो ह्रदय भी हुआ रूखा

डाली सूखी , सूखा उपवन
खग -विहग का करूँ क्रन्दन
चीरता दिल , करता टुकड़े -
माली का उजड़ा था उपवन

छोडो , वह तो है पुरानी
बात , ये सब कालवश था
मेरा ही मन था वो उपवन -
मैं था माली - मैं विवश था

आज जाने क्या हुआ है
कौन रौ है , क्या पता है
खाली -खाली आज दिल का
एक कोना भासता है ...

09.11.05