हे मृत्यु ,
तू व्यर्थ ही दर्प करती है क्यों ?
शक्तिशाली , भयावह - प्राणी तुझे कहते है ;
भयभीत होते हैं तुझ से व्यर्थ ही .
पर , ज्ञात है ये तो तुझे भी -
क्या हत् कर पाई है मुझे
तू कभी ?
सत्य है ये -
समस्त चराचर को एक दिन
संग तेरे जाना है ;
लेकिन
जीवट व साहस को मेरे
स्वयं ब्रह्म ने माना है .
तेरा कार्य तो नियत है भाग्य द्वारा -
लीन करना प्राणी - जगत को चिर -निद्रा में .
समर्थ तो है मदिरा मंत्र भी -
हमें निद्रित करने में
क्या फल है फिर -
हे मृत्यु
तुझसे व्यर्थ डरने में !
एक क्षणिक निद्रा
बस
फिर होंगे हम अनन्त चैतन्य
मुक्त होंगे त्रैलोक्य के इस बन्धन से -
सुख शान्ति के विराट प्रासाद में -
जहाँ तेरा पाश कभी न पहुँचा होगा -
मृत्यु , तुझे हत् होना होगा .
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