क्या मैं तुम्हे भुला पाया हूँ अभी ?
शायद हाँ , शायद नहीं ...
और क्या कभी भुला पाउँगा -
पता नही ; शायद - नही .
पर मैं जानता हूँ ,
मुझे तुम्हे नही भुलाना है .
भुलाना तो है मुझे
उस एहसास को
जो
न जाने कब , कैसे जन्मा था ;
जो
अब न जाने कैसे , भुलाये नही जाना चाहता .
बहुत कोशिश की है मैंने -
पर अंकुर अब पेड़ बन जड़ें जमा चुका है .
पेड़ कटेगा , गिरा दिया जाएगा ;
पर कभी -न -कभी
किसी वर्षा की फुहारों मैं
वह अंकुर फिर प्रयास करेगा
अंकुरित होने का .
मुझे भुलाना है उस अंकुर का वो प्रयास -
मुझे तुम्हे नही भुलाना -
भुलाना तो है मुझे वो
एहसास .
badia ha.....
ReplyDelete"Ehsas khubsurat ha aur sacha bhi ha...."
Welldone keep it up
Sapna Sharma