Friday, September 28, 2007

नवप्रभात

हाँ ,
मेरा स्वभाव ही ऐसा है
तुम कहते हो
'अरे , प्लीस ये कर दो न '
और मैं
पता नही क्यों
लगभग कृतज्ञ -सा हुआ कहता हूँ
'हाँ , ज़रूर कर दूंगा .'
'न ' नही कहता कभी ,
मना नही करता
हद -से -हद कह देता हूँ
'कोशिश तो करुंगा '
और
करता भी हूँ .
फिर चाहे इस कोशिश में
मुझे ख़ुद लाख तकलीफें उठानी पडें -
उठाऊंगा ,
पर - मना नही करुंगा .
क्यों ?
पता नही ...

न जाने कितनी ही बार
तुमने मुझे आहत किया है -
अपनी बातों से
अपने कामों से .
हाँ ,
मैं दुखी भी बहुत हुआ -
आख़िर
मनुष्य ही तो हूँ .
पर तुमने कहा 'सॉरी '
(वो भी शायद थोड़ा मज़ाक और उड़ाने के लिए )
तो
ये अवश्यक है
की मैं तुम्हे 'माफ़ ' कर दूँ .
हाँ , मुझे दुःख होगा -
पर मैं मुस्कुराउन्गा , तुम्हारे साथ हसुंगा .
(शायद ख़ुद पर )
क्यों ?
पता नही ...

शायद ये मेरा स्वभाव ही है .
ये पंक्तियाँ
आत्म - प्रशंसा हैं
आत्म -प्रताड़ना हैं
या
आत्म -विश्लेषण है -
निर्णय नही कर पा रहा .
यही अनिर्णय है
जो बार -बार
आहत करता है
मेरे आत्म -सम्मान को -
तार -तार कर
मुझे मजबूर कर देता है
तुम्हारी बात मान ने को
स्वयं की इच्छा को मारकर .

लेकिन आज
एक ज्वार उठा है
जिसने शांत पड़े
(या ज़बरदस्ती शांत रखे गए )
मानस को
झंझोड दिया है .
आज उस ज्वार ने
मेरे सम्पूर्ण अस्तित्व को हिला
मेरे वर्षों से सोये
आत्म-सम्मान को
जगा दिया है .
अब यदि तुम
मेरे स्वभाव को
मेरी कमजोरी समझने की भूल करोगे
तो
शायद पछताना पडे
क्यूंकि
आज नवप्रभात हुआ है .

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