Monday, December 26, 2016

रात्री ( निशा )

जब रवि छिप जाते क्षितिज पीछे ,
होतें हैं शशि शोभित नभ पे -
सपने जागते जगती के तब -
मन आकुल होते हैं सब के .

इठलाती पहने तारक - माल -
रजनी -बाला हरती मन को ,
शीतल समीर करता विदीर्ण
विरहित हृदय के प्रीतम को .

जुगनू करते जग -मग -जग -मग ,
पत्ते मर -मर -मर -मर करते हैं -
ध्यानस्थ -से बैठे वृक्षों पर
मानो उलूक तप करते हैं .

निद्रा देती उपहार उन्हें , विश्राम का
जो कर श्रम दिन भर
हो चुके क्लांत - फिर जागेंगे
एक नई चेतना को लेकर .

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