हे मृत्यु ,
तू व्यर्थ ही दर्प करती है क्यों ?
शक्तिशाली , भयावह - प्राणी तुझे कहते है ;
भयभीत होते हैं तुझ से व्यर्थ ही .
पर , ज्ञात है ये तो तुझे भी -
क्या हत् कर पाई है मुझे
तू कभी ?
सत्य है ये -
समस्त चराचर को एक दिन
संग तेरे जाना है ;
लेकिन
जीवट व साहस को मेरे
स्वयं ब्रह्म ने माना है .
तेरा कार्य तो नियत है भाग्य द्वारा -
लीन करना प्राणी - जगत को चिर -निद्रा में .
समर्थ तो है मदिरा मंत्र भी -
हमें निद्रित करने में
क्या फल है फिर -
हे मृत्यु
तुझसे व्यर्थ डरने में !
एक क्षणिक निद्रा
बस
फिर होंगे हम अनन्त चैतन्य
मुक्त होंगे त्रैलोक्य के इस बन्धन से -
सुख शान्ति के विराट प्रासाद में -
जहाँ तेरा पाश कभी न पहुँचा होगा -
मृत्यु , तुझे हत् होना होगा .
Friday, September 28, 2007
नवप्रभात
हाँ ,
मेरा स्वभाव ही ऐसा है
तुम कहते हो
'अरे , प्लीस ये कर दो न '
और मैं
पता नही क्यों
लगभग कृतज्ञ -सा हुआ कहता हूँ
'हाँ , ज़रूर कर दूंगा .'
'न ' नही कहता कभी ,
मना नही करता
हद -से -हद कह देता हूँ
'कोशिश तो करुंगा '
और
करता भी हूँ .
फिर चाहे इस कोशिश में
मुझे ख़ुद लाख तकलीफें उठानी पडें -
उठाऊंगा ,
पर - मना नही करुंगा .
क्यों ?
पता नही ...
न जाने कितनी ही बार
तुमने मुझे आहत किया है -
अपनी बातों से
अपने कामों से .
हाँ ,
मैं दुखी भी बहुत हुआ -
आख़िर
मनुष्य ही तो हूँ .
पर तुमने कहा 'सॉरी '
(वो भी शायद थोड़ा मज़ाक और उड़ाने के लिए )
तो
ये अवश्यक है
की मैं तुम्हे 'माफ़ ' कर दूँ .
हाँ , मुझे दुःख होगा -
पर मैं मुस्कुराउन्गा , तुम्हारे साथ हसुंगा .
(शायद ख़ुद पर )
क्यों ?
पता नही ...
शायद ये मेरा स्वभाव ही है .
ये पंक्तियाँ
आत्म - प्रशंसा हैं
आत्म -प्रताड़ना हैं
या
आत्म -विश्लेषण है -
निर्णय नही कर पा रहा .
यही अनिर्णय है
जो बार -बार
आहत करता है
मेरे आत्म -सम्मान को -
तार -तार कर
मुझे मजबूर कर देता है
तुम्हारी बात मान ने को
स्वयं की इच्छा को मारकर .
लेकिन आज
एक ज्वार उठा है
जिसने शांत पड़े
(या ज़बरदस्ती शांत रखे गए )
मानस को
झंझोड दिया है .
आज उस ज्वार ने
मेरे सम्पूर्ण अस्तित्व को हिला
मेरे वर्षों से सोये
आत्म-सम्मान को
जगा दिया है .
अब यदि तुम
मेरे स्वभाव को
मेरी कमजोरी समझने की भूल करोगे
तो
शायद पछताना पडे
क्यूंकि
आज नवप्रभात हुआ है .
मेरा स्वभाव ही ऐसा है
तुम कहते हो
'अरे , प्लीस ये कर दो न '
और मैं
पता नही क्यों
लगभग कृतज्ञ -सा हुआ कहता हूँ
'हाँ , ज़रूर कर दूंगा .'
'न ' नही कहता कभी ,
मना नही करता
हद -से -हद कह देता हूँ
'कोशिश तो करुंगा '
और
करता भी हूँ .
फिर चाहे इस कोशिश में
मुझे ख़ुद लाख तकलीफें उठानी पडें -
उठाऊंगा ,
पर - मना नही करुंगा .
क्यों ?
पता नही ...
न जाने कितनी ही बार
तुमने मुझे आहत किया है -
अपनी बातों से
अपने कामों से .
हाँ ,
मैं दुखी भी बहुत हुआ -
आख़िर
मनुष्य ही तो हूँ .
पर तुमने कहा 'सॉरी '
(वो भी शायद थोड़ा मज़ाक और उड़ाने के लिए )
तो
ये अवश्यक है
की मैं तुम्हे 'माफ़ ' कर दूँ .
हाँ , मुझे दुःख होगा -
पर मैं मुस्कुराउन्गा , तुम्हारे साथ हसुंगा .
(शायद ख़ुद पर )
क्यों ?
पता नही ...
शायद ये मेरा स्वभाव ही है .
ये पंक्तियाँ
आत्म - प्रशंसा हैं
आत्म -प्रताड़ना हैं
या
आत्म -विश्लेषण है -
निर्णय नही कर पा रहा .
यही अनिर्णय है
जो बार -बार
आहत करता है
मेरे आत्म -सम्मान को -
तार -तार कर
मुझे मजबूर कर देता है
तुम्हारी बात मान ने को
स्वयं की इच्छा को मारकर .
लेकिन आज
एक ज्वार उठा है
जिसने शांत पड़े
(या ज़बरदस्ती शांत रखे गए )
मानस को
झंझोड दिया है .
आज उस ज्वार ने
मेरे सम्पूर्ण अस्तित्व को हिला
मेरे वर्षों से सोये
आत्म-सम्मान को
जगा दिया है .
अब यदि तुम
मेरे स्वभाव को
मेरी कमजोरी समझने की भूल करोगे
तो
शायद पछताना पडे
क्यूंकि
आज नवप्रभात हुआ है .
अंतर्दर्शन / खोज
रिश्ते सारे अब बदल गए
मुझ में तुझ में वो बात नही .
अब राहें अपनी जुदा -जुदा
कुछ तेरा -मेरा साथ नही .
पर पता नही क्यों कभी कभी
न जाने कहाँ से , चुपके -से
एक याद तेरी जो आती है
जागे कुछ अरमां दुबके -से .
'मैंने तुझको है भुला दिया '
ये मन तो मान नही पाता ,
मैं मूर्ख बनाता हूँ ख़ुद को -
आइना मुझे ये दिखलाता .
मैं तो अब ख़ुद से हार चुका
तेरी बातें करते करते ,
अब ' वो ' ही राह दिखायेगा -
मैंने सोचा चलते चलते .
मुझ में तुझ में वो बात नही .
अब राहें अपनी जुदा -जुदा
कुछ तेरा -मेरा साथ नही .
पर पता नही क्यों कभी कभी
न जाने कहाँ से , चुपके -से
एक याद तेरी जो आती है
जागे कुछ अरमां दुबके -से .
'मैंने तुझको है भुला दिया '
ये मन तो मान नही पाता ,
मैं मूर्ख बनाता हूँ ख़ुद को -
आइना मुझे ये दिखलाता .
मैं तो अब ख़ुद से हार चुका
तेरी बातें करते करते ,
अब ' वो ' ही राह दिखायेगा -
मैंने सोचा चलते चलते .
एहसास
क्या मैं तुम्हे भुला पाया हूँ अभी ?
शायद हाँ , शायद नहीं ...
और क्या कभी भुला पाउँगा -
पता नही ; शायद - नही .
पर मैं जानता हूँ ,
मुझे तुम्हे नही भुलाना है .
भुलाना तो है मुझे
उस एहसास को
जो
न जाने कब , कैसे जन्मा था ;
जो
अब न जाने कैसे , भुलाये नही जाना चाहता .
बहुत कोशिश की है मैंने -
पर अंकुर अब पेड़ बन जड़ें जमा चुका है .
पेड़ कटेगा , गिरा दिया जाएगा ;
पर कभी -न -कभी
किसी वर्षा की फुहारों मैं
वह अंकुर फिर प्रयास करेगा
अंकुरित होने का .
मुझे भुलाना है उस अंकुर का वो प्रयास -
मुझे तुम्हे नही भुलाना -
भुलाना तो है मुझे वो
एहसास .
शायद हाँ , शायद नहीं ...
और क्या कभी भुला पाउँगा -
पता नही ; शायद - नही .
पर मैं जानता हूँ ,
मुझे तुम्हे नही भुलाना है .
भुलाना तो है मुझे
उस एहसास को
जो
न जाने कब , कैसे जन्मा था ;
जो
अब न जाने कैसे , भुलाये नही जाना चाहता .
बहुत कोशिश की है मैंने -
पर अंकुर अब पेड़ बन जड़ें जमा चुका है .
पेड़ कटेगा , गिरा दिया जाएगा ;
पर कभी -न -कभी
किसी वर्षा की फुहारों मैं
वह अंकुर फिर प्रयास करेगा
अंकुरित होने का .
मुझे भुलाना है उस अंकुर का वो प्रयास -
मुझे तुम्हे नही भुलाना -
भुलाना तो है मुझे वो
एहसास .
विलाप
संगीत खो चुका हूँ ,
मैं तान खो चुका हूँ ,
हा ! हारता गया मैं ,
पहचान खो चुका हूँ ...
न कोई आस बाकी ,
न ही कोई उमंगें -
अब न रहा वो सागर ,
अब न रही तरंगे ...
मुर्दा है जिस्म अब ये ,
पर मैं तो जीं रहा हूँ ;
ये जीना कैसा जीना -
मैं जान खो चुका हूँ ...
मैं तान खो चुका हूँ ,
हा ! हारता गया मैं ,
पहचान खो चुका हूँ ...
न कोई आस बाकी ,
न ही कोई उमंगें -
अब न रहा वो सागर ,
अब न रही तरंगे ...
मुर्दा है जिस्म अब ये ,
पर मैं तो जीं रहा हूँ ;
ये जीना कैसा जीना -
मैं जान खो चुका हूँ ...
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