Sunday, March 04, 2007

अजन्मा

मैं आना चाहता था जग में
पर शायद तू ना चाहता था
खेलूं में किसी के आँगन में
तेरे मन को ना भाता था ...

मैं रहता था तेरे घर में
तब तू खुश मुझ से रहता था
तब तू मुझको 'बेटा' कहकर
कितने ही लाड लडाता था...

एक दिन तुने ही तो मुझको
वो सुन्दर घर दिखलाया था
कितने अच्छे थे वे दोनों -
मैं देख उन्हें हर्षाया था ..

तब ही था मैंने सोच लिया
अब उनके पास ही जाना है
तेरे संग काफी खेल लिया
कुछ वहां भी खेल दिखाना है

और एक दिन मौका पा कर के
मैं तेरा आँगन छोड़ चला
जो तुझसे नेह के बंधन थे
एक झटके ही में तोड़ चला

उस समय तो मेरे मन में बस
एक ही था सपना घुमड़ रहा
उस नेह बरसते आँगन में
एक प्रेम का सागर उमड़ रहा

आहा ! कितने अच्छे दिन थे
सारे कितने खुश दिखते थे
वो ख़ुशी छलक ही जातइ थी
चाहे वो जो भी करते थे

अबतो मुझको ये लगता था
जल्दी सपना पूरा होगा
इन बाहों में मैं खेलूँगा
और यहाँ मेरा झूला होगा

मै तो था तुझको भूल गया
पर तू ना मुझको भूल सका
ना खेला मैं उन बाहों में
मैं ना झूले में झूल सका

तूने सोचा मेरी तो जगह
है अभी तेरे ही आँगन में
और इसीलिए एक ह्रदय नहीं
निर्माण किया मेरे सीने

इक झटके से जिस तरह कभी
वो नेह का बंधन तोडा था
उसको दोहराने को शायद
तू लेने मुझको दौड़ा था

छोडा सबको मैंने रोता
सब लोग थे हाय ! बिलख रहे
जो अजन्मा है उस मृत्यु पर
ये सारे फिर भी सिसक रहे

पर तू तो इनका विधाता है
क्या खेल है तूने दिखलाया
जब तोड़ना था ये सव्पना तुझे
क्यूँ इनको फिर ये दिखलाया ??

मेरा क्या मै तो फिर इक दिन
तेरे आँगन को छोडूंगा
ये वादा करता हूँ तुझसे
नाता इनसे ही जोडूंगा ...

24.02.03